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सीसीएफ के फैसले के इंजार में कबाड़ बन रहे वाहन राजस्व दस्तावेजो में दर्ज भूमि को वन विभाग आरक्षित वन क्षेत्र बता रहा

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बैतूल। मप्र राज्य। भारतीय वन अधिनियम 1927 में मप्र राज्य सरकार द्वारा वर्ष 1983 में अध्याय 9 में संषोधन कर नए कानून राजसात के जोड़े गए थें। अधिनियम 1927 की धारा 52 में राज्य सरकार के संषोधन के बाद से ही आषंका जताई जा रहीं थी कि वन विभाग इसका दुरूपयोग आम नागरिको के विरूद्ध करेंगा। हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल भी हुई लेकिन समस्त आषंकाओं को खारिज भी कर दिया गया था। आषंका यह थी कि वन विभाग राजसात की कार्यवाही में नागरिको का उत्पीड़न करेंगा, नागरिक अधिकारों का हनन करेगा, इसलिए न्याय करने की शक्ति वन विभाग के पास नहीं बल्कि न्यायपालिका के पास होना चाहिए। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा था कि कोई भी व्यक्ति स्वयं के मामले की सुनवाई नहीं कर सकता हैं।

बैतूल जिले का वन विभाग ग्रामीण कृषको के वाहनों को जप्त कर लेता हैं। वाहनों में मौजूद खनिज को वन उपज बता देता हैं, वन अपराध दस्तावेजो में उत्खनन स्थल को वन भूमि बता देता हैं। कानून के दायरे के बाहर जाकर खनिज का मूल्यांकन वन विभाग स्वयं करता हैं। आगे जाकर वाहन राजसात हो जाता हैं। यह उन वाहनो के साथ किया जाता हैं जिनके पास खनिज विभाग की ईटीपी नहीं पाई जाती हैं। अधिनियम की धारा 52 (क) में मुख्य वन संरक्षक, अपील की सुनवाई करते हैं लेकिन उनके लिए स्वयं के विभाग को गलत ठहराना कठिन होता हैं, भारत की सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के पूर्व फैसलो को दरकिनार कर राजसात की कार्यवाही को सही ठहरा देते हैं। वन विभाग में राजसात की कार्यवाही एैसे ही की जाती हैं। विधि, न्याय एवं मानवाधिकार में आस्था रखने वाले इसे अन्याय परख ठहराते हैं, लेकिन सुनने वाला हैं कौन?

वन परिक्षेत्राधिकारी, सारणी का वन अपराध क्र0 184/23 में 19.02.2020 को रात्री करीब 01 बजे धोड़ाडोगरी बीट कक्ष आर0 एफ0 357 की सीमा तवा नदी ग्राम डुल्हारा के पास 03 ट्रक, एक बोलेरो जीप एवं एक मोटर साईकल को जप्त किया गया था। तीन ट्रको में 5.900 घ0मी0 कोयला बताया गया। आस पास लगे ढ़ेर में कोयला बताया गया। कुल जप्त कोयला 11.986 घनमीटर बताया गया हैं।

उप वन मंडलाधिकारी शाहपुर (सा0) द्वारा भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 52 के प्रावधानों के विपरीत जाकर वन अपराध के प्रकरण में विचारण की प्रक्रिया का अनुसरण किया गया, वनकर्मियों के कथन दर्ज किए गए, वाहन स्वामी से गवाहों का प्रतिपरीक्षण करने के लिए कहा गया लेकिन अधिवक्ता नियुक्त नहीं करने दिया गया। अंततः तीन ट्रको, एक बोलेरो जीप एवं मोटर साईकल को राजसात कर लिया गया।

अपीलीय अधिकारी एवं मुख्य वन संरक्षक, बैतूल द्वारा धारा 52 में अपील पर सुनवाई की गई। अपीलार्थी द्वारा विधि एवं न्याय के प्रष्न उठाए गए, सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के फैसले पेष किए गए। अपील को आंषिक खारिज करते हुए कुछ तथ्यों की 30 दिवस में पुनः जांच के आदेष दिए गए हैं।

वन अपराध के एक्सपर्ट अधिवक्ता भारत सेन कहते हैं कि खनिज कोयला का वजन टन में किया जाता हैं, लेकिन वन विभाग धनमीटर में नापता हैं। वाहनों को राजस्व भूमि से जप्त किया गया हैं, वन विभाग उत्खनन स्थल को वन भूमि आर0एफ0 357 बता रहा हैं जिसे राजस्व विभाग अपनी भूमि 376 (एस) बता रहा हैं। पीओआर 184/23 में वन अपराध के दस्तावेजो में वाहन स्वामी की भूमिकाएं उत्खननकर्ता की नहीं हैं, लेकिन उत्खनन करने वाले कौन थे, तवा नदी से कोयला परिवहन कर कैसे लाया जाता था, वन विभाग को पता नहीं हैं। वाहनों को परिवहन करते हुए नहीं पाया गया था। इसके अतिरिक्त अधिनियम की धारा 52 में वन अधिकारी केवल उन्ही वाहनों को जप्त कर सकता हैं जिसमें वन उपज मौजूद हैं तो इस तरह से बोलेरो जीप एवं मोटर साईकल को जप्त करने का कोई अधिकार नहीं था। वन विभाग जिस पत्थर को कोयला बता रहा हैं हो सकता हैं कि रिजेक्टेड कोल भी हो सकता हैं लेकिन वन विभाग को पता नहीं हैं कि कोयला किस ग्रेड का हैं? वन विभाग ने कोयला के सैम्पल जप्त नहीं किए हैं।

वन विभाग ने वन अपराध दस्तावेजो में वाहनों में कोयला बताया गया हैं जिसका मूल्यांकन 48 हजार रूपए बताया गया हैं जो कि वजन में 01 टन भी नहीं हैं। वाहनों में कोयला परिवहन की कथा को इसलिए भी काल्पनिक माना जा सकता हैं कि तीन वाहनो में 60 टन कोयला परिवहन की क्षमता हैं तो 01 टन से कम वजन के कोयले के लिए कोई वाहन स्वामी अपना वाहन आखिर क्यों भेजेगा? कानून एवं न्याय का सवाल यह हैं कि वाहनों में 48 हजार रूपए के कोयले के लिए क्या 90 लाख रूपए कीमत के तीन वाहनों का राजसात किया जाना उचित हैं जबकि वन अपराध दस्तावेजो में तमाम कानूनी खामियां मौजूद हैं।

मुख्य वन संरक्षक बैतूल के आदेष पर उप वन मंडलाधिकारी मामले में 30 दिवसीय जांच कर रहे हैं जो कि पिछले 90 दिनों से जारी हैं। वन विभाग में प्रचलित परंपरा में एक वन अधिकारी दूसरे वन अधिकारी की अपराध अनुसंधान में मौजूद उपेक्षा एवं लापरवाही को हमेषा नजर अंदाज करता चला जाता हैं, जिसे वन विभाग में न्यायदान कहा जाता हैं। वन विभाग का लक्ष्य तो धारा 68 में जप्त वन उपज को 01 हजार रूपए मूल्य से अधिक बताना हैं जिसमें वह कामयाब भी हुआ हैं।

वन विधि के जानकार भारत सेन अधिवक्ता कहते हैं कि वर्ष 1983 में धारा 68 में 01 हजार रूपए की वन उपज के मूल्य उचित था लेकिन वर्तमान में राजसात के लिए इसे 02 लाख रूपए करने की जरूरत हैं। वन विधि में धारा 52 (क) को समाप्त करने की जरूरत हैं क्योंकि अपील सदैव विचारण न्यायालय के दण्डादेष के विरूद्ध की जाती हैं लेकिन धारा 52 (4) में उप वन मंडलाधिकारी कोई विचारण न्यायालय नहीं हैं, साक्ष्य दर्ज करने की उसे कानून में वैधानिक अधिकार नहीं दिया गया हैं तो अपील किस बात की होती हैं?

नौकरषाही को कोई फर्क नहीं पड़ता हैं लेकिन 19.02.2020 से वाहन वन परिक्षेत्राधिकारी, रानीपुर के परिसर में कबाड़ बन रहे हैं। वन विभाग अवैध जप्ति को वैध बताने में लगा हुआ हैं तो नौकरषाही को अपनी कार्यवाही में कोई दोष नजर नहीं आ रहा हैं। नौकरषाही आम नागरिको पर झूठे वन अपराध के मुकदमें दर्ज करके उनकी संपत्ति को कानून की प्रक्रिया की आड़ में हडपने के लिए हर स्तर पर प्रयास कर रहीं हैं तो सीसीएफ बैतूल वाहनो को मुक्त करने के लिए तैयार नहीं हैं चाहे उसमें वन उपज हैं अथवा नहीं हैं, जप्ती स्थल वन भूमि हैं अथवा नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के पूर्व निर्णय को उप वन मंडलाधिकारी एवं मुख्य वन संरक्षक कुछ नहीं समझते हैं। सीसीएफ बैतूल का पूर्ण फैसला अभी आना बाकी हैं।

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